खैरागढ़। शिक्षा विभाग की कार्यशैली भी कमाल की है। शासन आदेश जारी करता है, अधिकारी बैठक करते हैं, फाइलें इधर से उधर घूमती हैं, लेकिन जब बात आदेश लागू करने की आती है तो लगता है जैसे सरकारी मशीनरी "विचाराधीन" मोड में चली जाती है।
ताजा मामला विकासखंड छुईखदान के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, जंगलपुर का है। शासन ने संलग्न (अटैच) शिक्षकों को उनके मूल विद्यालय में लौटाने का स्पष्ट निर्देश जारी किया, लेकिन जंगलपुर के दो व्याख्याता आज भी अपने मूल विद्यालय तक नहीं पहुंच पाए। सवाल यह है कि आदेश सिर्फ कागज के लिए था या पालन के लिए भी?
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जानकारी के अनुसार, अंग्रेजी व्याख्याता बोधन जोशी वर्तमान में आदिम जाति एवं अनुसूचित जाति विकास विभाग के जिला कार्यालय में क्षेत्र संवाहक के रूप में कार्यरत हैं, जबकि जीवविज्ञान व्याख्याता कल्पना अग्रवाल स्वामी आत्मानंद उत्कृष्ट विद्यालय, छुरिया में संलग्न हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि शासन का आदेश आने के बाद भी जिम्मेदार अधिकारी शायद सही "मुहूर्त" का इंतजार कर रहे हैं। कई बार आवेदन दिए गए, जनप्रतिनिधियों से गुहार लगाई गई, कलेक्टर और शिक्षा विभाग के अधिकारियों का ध्यान भी दिलाया गया, लेकिन परिणाम अब तक शून्य ही रहा।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर शासन का आदेश ही लागू नहीं होना है, तो फिर आदेश जारी करने का औचित्य क्या है? क्या सरकारी आदेश केवल फाइलों की शोभा बढ़ाने के लिए जारी किए जाते हैं?
उधर, जंगलपुर विद्यालय के छात्र-छात्राएं विषय विशेषज्ञ शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। पढ़ाई प्रभावित हो रही है, लेकिन व्यवस्था मानो यह संदेश दे रही हो कि "विद्यार्थियों का भविष्य इंतजार कर सकता है, फाइलों को जल्दी क्या है?"
ग्रामीणों ने मांग की है कि दोनों व्याख्याताओं को तत्काल उनके मूल विद्यालय में कार्यभार ग्रहण कराया जाए। उनका कहना है कि यदि जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो वे लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण आंदोलन करेंगे।
अब देखने वाली बात यह होगी कि शिक्षा विभाग पहले आदेश का पालन करता है या फिर एक और बैठक बुलाकर नई फाइल खोल देता है।


