खैरागढ़। विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच केसीजी जिले का ग्राम पंचायत सोनपुरी एक ऐसी हकीकत बयां कर रहा है, जहां किसानों ने अपनी दूरदर्शिता और आपसी भाईचारे से गांव की तस्वीर तो बदल दी, लेकिन शासन-प्रशासन की सुस्त कार्यप्रणाली ने 20 वर्षों से उनकी सबसे बड़ी समस्या को अधर में लटका रखा है।
करीब 20 वर्ष पहले सोनपुरी के किसानों ने गांव के भविष्य को संवारने के लिए एक ऐतिहासिक निर्णय लिया। गांव में अधिकांश किसानों की जमीन अलग-अलग स्थानों पर बिखरी हुई थी, जिससे खेती करना कठिन और खर्चीला था। सिंचाई की व्यवस्था भी प्रभावित होती थी और रोजगार के अभाव में बड़ी संख्या में ग्रामीण शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर थे।
इसी समस्या का समाधान निकालने के लिए गांव के किसानों ने आपसी सहमति और भाईचारे के साथ अपनी कृषि भूमि का आपसी तबादला (चकबंदी) कर लिया। इसके बाद खेत एक जगह होने लगे, बोर खनन हुए, सिंचाई व्यवस्था बेहतर हुई, खेती व्यवस्थित हुई और उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। इसका परिणाम यह हुआ कि जो गांव कभी पलायन के लिए जाना जाता था, वहां आज लगभग 95 प्रतिशत किसान अपने गांव में रहकर खेती-किसानी से सम्मानपूर्वक जीवनयापन कर रहे हैं।
लेकिन जिस चकबंदी ने गांव की तकदीर बदल दी, उसका सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक कार्य—स्थायी बंदोबस्त—आज तक पूरा नहीं हो सका। वर्तमान में खेतों पर खेती करने वाले किसान अलग हैं, जबकि राजस्व रिकॉर्ड में जमीन आज भी पुराने खातेदारों के नाम दर्ज है। इस विसंगति के कारण किसानों को नामांतरण, ऋण, सरकारी योजनाओं, मुआवजा, दस्तावेजी प्रक्रिया और अन्य राजस्व कार्यों में लगातार परेशानी उठानी पड़ रही है। वर्षों से किसान आर्थिक और प्रशासनिक नुकसान झेल रहे हैं।
विडंबना यह है कि सोनपुरी को छत्तीसगढ़ के माननीय राज्यपाल का गोदग्राम बनने का गौरव प्राप्त है। गोदग्राम घोषित होने के बाद ग्रामीणों को उम्मीद थी कि वर्षों से लंबित इस महत्वपूर्ण समस्या का समाधान प्राथमिकता से होगा। लेकिन आज भी किसान उसी उम्मीद के सहारे बैठे हैं।
ग्रामीणों के अनुसार इस मुद्दे को लेकर कई बार तहसीलदार, एसडीएम, कलेक्टर, विधायक, सांसद, मुख्यमंत्री तक गुहार लगाई जा चुकी है। इतना ही नहीं, गांव के किसानों ने तीन बार माननीय राज्यपाल महोदय के समक्ष भी इस विषय की मॉनिटरिंग कराई तथा ग्राम सरपंच ने स्वयं लोक भवन पहुंचकर भी स्थायी बंदोबस्त की मांग उठाई। इसके बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि प्रशासन समय रहते स्थायी बंदोबस्त की प्रक्रिया पूरी कर देता है, तो वर्षों से चली आ रही यह समस्या समाप्त हो जाएगी और किसानों को उनका वैधानिक अधिकार मिल सकेगा। यह केवल भूमि रिकॉर्ड का मामला नहीं, बल्कि उन किसानों के सम्मान और अधिकार का प्रश्न है, जिन्होंने आपसी एकता और सामाजिक समरसता से गांव का भविष्य संवारने का काम किया।
आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब राज्यपाल के गोदग्राम के किसानों की दो दशक पुरानी मांग ही पूरी नहीं हो पा रही है, तो फिर गोदग्राम योजना का वास्तविक लाभ आखिर ग्रामीणों तक कब पहुंचेगा?
जिस गांव ने अपनी एकता और दूरदर्शिता से विकास की मिसाल कायम की, वह आज भी केवल एक सरकारी हस्ताक्षर और वर्षों से लंबित स्थायी बंदोबस्त का इंतजार कर रहा है।

