खैरागढ़। त्योहारी सीजन आते ही खाद्य एवं औषधि प्रशासन (खाद्य सुरक्षा विभाग) की सक्रियता अचानक बढ़ जाती है। मिठाई दुकानों में निरीक्षण, सैंपल लेने और जांच करने की कवायद शुरू हो जाती है। विभागीय टीम की दुकानों में दबिश देखकर ऐसा लगता है मानो अब मिलावटखोरों की खैर नहीं। लेकिन सवाल यह है कि इन निरीक्षणों का नतीजा आखिर निकलता क्या है?
खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और आम जनता की सेहत की जिम्मेदारी संभालने वाले विभाग की कार्यप्रणाली पर अब सवाल उठने लगे हैं। मिठाई, खोवा, पनीर और अन्य खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता को लेकर यदि मौके पर ही गड़बड़ी नजर आती है, तो नियमानुसार आगे की जांच और कार्रवाई की प्रक्रिया तत्काल क्यों स्पष्ट नहीं होती? क्या निरीक्षण और सैंपल लेने तक ही विभाग की जिम्मेदारी पूरी हो जाती है?
स्थानीय स्तर पर मिल रही शिकायतों और चर्चाओं के मुताबिक, कुछ दुकानों में कथित तौर पर संदिग्ध गुणवत्ता और एक्सपायरी खाद्य सामग्री मिलने के बावजूद प्रभावी कार्रवाई दिखाई नहीं देती। यदि ऐसा है, तो विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि संबंधित मामलों में क्या कार्रवाई की गई? क्या खाद्य सामग्री जब्त की गई, क्या बिक्री पर रोक लगाई गई और क्या नियमानुसार चालान या अन्य वैधानिक कार्रवाई की गई?
सैंपल रिपोर्ट में महीनों लगते हैं, तब तक उपभोक्ता क्या करे?
इस संबंध में विभाग से संपर्क करने पर बताया गया कि खाद्य पदार्थों के सैंपल की रिपोर्ट आने में कई सप्ताह, कभी-कभी एक महीने से भी अधिक समय लग जाता है। रिपोर्ट में देरी प्रयोगशाला की प्रक्रिया का हिस्सा हो सकती है, लेकिन इस बीच उपभोक्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विभाग क्या कदम उठाता है, यह जानना भी जरूरी है।
सवाल यह भी है कि यदि किसी खाद्य पदार्थ की गुणवत्ता पर निरीक्षण के दौरान गंभीर संदेह हो, तो रिपोर्ट आने तक उसकी बिक्री रोकने या अन्य एहतियाती कदम उठाने का प्रावधान किन परिस्थितियों में लागू किया जाता है?
छोटे दुकानदारों पर सख्ती, बड़े कारोबारियों पर नरमी?
स्थानीय स्तर पर यह शिकायत भी सामने आ रही है कि विभाग की कार्रवाई छोटे दुकानदारों तक अधिक सीमित दिखाई देती है, जबकि बड़े खाद्य कारोबारियों के निरीक्षण और कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आती। हालांकि इस शिकायत की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन विभाग को निरीक्षण का पूरा रिकॉर्ड प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से सार्वजनिक कर इस तरह की आशंकाओं को दूर करना चाहिए।
आखिर खाद्य सुरक्षा के नियम छोटे और बड़े कारोबारियों के लिए अलग-अलग तो नहीं हो सकते? यदि नियम सभी के लिए समान हैं, तो कार्रवाई भी समान रूप से दिखाई देनी चाहिए।
जवाब मांगने पर अधिकारी ने क्या कहा ?
विभाग की कार्यवाही को लेकर जब संबंधित अधिकारियों से जानकारी मांगी गई, तो एक अधिकारी ने सैंपल रिपोर्ट में देरी की बात कही तो दूसरे अधिकारी दीपक घृतलहरे फ़ूड सेफ्टी ऑफिसर ने पिछले सीजन में दो दुकानदारों पर बड़ी कार्यवाही होने की बात कही जिसको पेनल्टी भी लगा है, वही लीगल कार्यवाही 8 तो निगरानी नमूना 14 होने की बात कही.
जनता की सेहत से बड़ा क्या कोई दूसरा काम है?
खाद्य सुरक्षा विभाग का काम केवल त्योहारों के पहले दुकानों में पहुंचकर सैंपल लेना या निरीक्षण की औपचारिकता पूरी करना नहीं है। खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 के तहत विभाग को खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने, मिलावट और असुरक्षित खाद्य सामग्री की बिक्री रोकने तथा नियमों के उल्लंघन पर वैधानिक कार्रवाई करने की जिम्मेदारी दी गई है।
अब विभाग को बताना चाहिए कि इस त्योहारी सीजन में कितनी दुकानों का निरीक्षण किया गया? कितने सैंपल लिए गए? कितनी रिपोर्ट प्राप्त हुईं? कितने मामलों में मिलावट या गुणवत्ता संबंधी गड़बड़ी प्रमाणित हुई और कितने कारोबारियों पर कार्रवाई की गई?
क्योंकि सवाल सिर्फ मिठाई की मिठास का नहीं, जनता की सेहत का है। निरीक्षण की तस्वीरें और सैंपल की संख्या नहीं, बल्कि मिलावट पर हुई वास्तविक कार्रवाई ही विभाग की सक्रियता का पैमाना होनी चाहिए।



