खैरागढ़। Indira kala sangit vishvvidyalay khairagarh : जिस खैरागढ़ की पहचान वर्ष 1956 से ‘कला तीर्थ’ के रूप में बनी, उसी खैरागढ़ के संगीत विश्वविद्यालय में आज छात्राओं का गुस्सा धरने के रूप में सामने आया। अलग-अलग संकायों में अध्ययनरत छात्राओं ने प्रदर्शन करते हुए कुलपति को हटाने की मांग की।
अब सवाल थोड़ा संगीत वाला है—जब संगीत विश्वविद्यालय में ही वाद्य यंत्रों की कमी हो, तो विद्यार्थी सुर साधें या पहले अपना तबला ढूंढें?
छात्राओं का कहना है कि संगीत संकाय में तबला, हारमोनियम, ढोलक और तानपुरा जैसे वाद्य यंत्रों की पर्याप्त उपलब्धता नहीं है, जिसके कारण कई विद्यार्थियों को अपने घर से ही वाद्य यंत्र लेकर आना पड़ता है। यानी विश्वविद्यालय में प्रवेश तो संगीत सीखने के लिए लिया, लेकिन रियाज का सामान लेकर घर से निकलना भी जरूरी हो गया!
### ‘संगीत विश्वविद्यालय’ में संगीत साधना या साधनों की तलाश?
विश्वविद्यालय को लेकर छात्रों की ओर से सुविधाओं और व्यवस्थाओं पर सवाल उठाए जा रहे हैं। प्रदर्शन कर रही छात्राओं ने प्रबंधन की कार्यप्रणाली को लेकर नाराजगी जाहिर की और कुलपति के खिलाफ अपनी मांगें रखीं।
व्यंग्य की बात यह है कि जहां दुनिया खैरागढ़ से संगीत सीखने आती है, वहां विद्यार्थी अपने वाद्य यंत्र लेकर संगीत सीखने पहुंच रहे हैं।
छात्रों का आरोप है कि विश्वविद्यालय में शैक्षणिक एवं मूलभूत सुविधाओं से जुड़ी कई समस्याएं हैं। उनका कहना है कि बेहतर शिक्षा और भविष्य की उम्मीद लेकर देश-विदेश से विद्यार्थी खैरागढ़ आते हैं, लेकिन अपेक्षित सुविधाएं नहीं मिलने से निराशा होती है।
### दावे बड़े-बड़े, सवाल जमीन पर
कुलपति के कार्यकाल में विश्वविद्यालय को बेहतर बनाने के प्रयासों और विकास के दावों की बात कही जाती रही है। लेकिन अब छात्राओं के प्रदर्शन ने इन दावों के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
छात्रों की शिकायतों में वाद्य यंत्रों की उपलब्धता, चिकित्सा सुविधा, विभिन्न कार्यक्रमों में विद्यार्थियों की भागीदारी और शैक्षणिक व्यवस्था जैसे मुद्दे शामिल बताए जा रहे हैं।
अब सवाल यह है कि खैरागढ़ के इस कला तीर्थ में सुरों की साधना होगी या विद्यार्थी पहले सुविधाओं की तलाश में सुर लगाते रहेंगे?
क्योंकि—
> तबला नहीं है... तो ताल कैसे बनेगी?
> हारमोनियम नहीं है... तो संगत कैसे होगी?
> तानपुरा नहीं है... तो सुर कैसे साधेंगे?
> और अगर विद्यार्थी ही अपना वाद्य लेकर आएंगे, तो विश्वविद्यालय आखिर किस बात का?
छात्राओं के आज के प्रदर्शन ने विश्वविद्यालय प्रबंधन के सामने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि कागजों पर बेहतर व्यवस्था और जमीन पर विद्यार्थियों की परेशानी के बीच आखिर इतना बड़ा अंतर क्यों है?
अब देखना होगा कि विश्वविद्यालय प्रबंधन इन सवालों का जवाब सुर में देता है या फिर मामला हमेशा की तरह बेसुरा ही रह जाता है।
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