खैरागढ़। इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय में कुलपति प्रो. (डॉ.) लवली शर्मा की अध्यक्षता में पद्मविभूषण स्वर्गीय तीजन बाई को समर्पित सांगीतिक श्रद्धांजलि कार्यक्रम का गरिमामय आयोजन किया गया। कार्यक्रम में पंडवानी की वेदमती और कापालिक शैलियों में प्रभावशाली प्रस्तुतियों के माध्यम से महान लोकगायिका तीजन बाई को श्रद्धासुमन अर्पित किए गए।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पद्मश्री उषा बारले उपस्थित रहीं। इसके अलावा चेतन देवांगन, रम्भा बाई देशमुख, सावित्री पारधी, रेडु देशमुख (तीजन बाई परिवार), आलिम बंशी, केवल देशमुख, चैतराम साहू, रामचंद निषाद, नरोत्तम निषाद तथा तीजन बाई के वरिष्ठ संगतकार डालेश्वर निर्मल की उपस्थिति रही। विश्वविद्यालय के कुलसचिव वेंकटरमन गुड़े, लोकसंगीत विभाग के अधिष्ठाता प्रो. डॉ. राजन यादव, संगीत संकाय के अधिष्ठाता प्रो. डॉ. नमन दत्त सहित विश्वविद्यालय परिवार के सदस्य भी कार्यक्रम में मौजूद रहे।
दुष्यंत द्विवेदी ने वेदमती शैली में प्रस्तुत किया ‘द्रौपदी स्वयंवर’
कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण सुप्रसिद्ध पंडवानी कलाकार दुष्यंत द्विवेदी की प्रस्तुति रही। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा वर्ष 2016 में संगीत नाटक अकादमी के प्रतिष्ठित उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ युवा पुरस्कार से सम्मानित द्विवेदी ने वेदमती शैली में ‘द्रौपदी स्वयंवर’ का सजीव और प्रभावशाली गायन प्रस्तुत किया।
वर्ष 2020 में उन्हें संस्कृति मंत्रालय की संस्था सांस्कृतिक स्रोत एवं प्रशिक्षण केंद्र (CCRT) की जूनियर फेलोशिप भी प्राप्त हुई थी। वर्ष 2025 में उन्हें भाग्य विधाता सम्मान से सम्मानित किया गया। वे देश के विभिन्न प्रतिष्ठित सांस्कृतिक मंचों पर पंडवानी की प्रस्तुति दे चुके हैं। इनमें गुवाहाटी, सिलचर, नई दिल्ली, सूरत, इम्फाल, प्रयागराज महाकुंभ-2025 के कलाग्राम, मुंबई फिल्म सिटी सहित अनेक मंच शामिल हैं। फरवरी 2026 में नई दिल्ली में भारत के कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन के निवास पर भी उन्होंने विशेष प्रस्तुति दी थी।
दूजन बाई ने ‘द्रौपदी चीरहरण’ से किया भाव-विभोर
बिलासपुर की वरिष्ठ पंडवानी गायिका दूजन बाई ने कापालिक शैली में ‘द्रौपदी चीरहरण’ प्रसंग की मार्मिक प्रस्तुति दी। उनकी भावपूर्ण गायकी और सशक्त अभिनय ने सभागार में मौजूद दर्शकों को भाव-विभोर कर दिया। दूजन बाई छत्तीसगढ़ सहित देश के कई राज्यों के प्रतिष्ठित सांस्कृतिक मंचों पर अपनी प्रस्तुतियों के लिए पहचान रखती हैं।
वहीं विश्वविद्यालय के लोकसंगीत विभाग के छात्र हर्ष चंद्राकर ने कापालिक शैली में ‘दुःशासन वध’ प्रसंग का ओजपूर्ण गायन प्रस्तुत किया। उनकी प्रस्तुति को उपस्थित विद्वानों और दर्शकों ने खूब सराहा। कबीरधाम जिले के ग्राम मथानी खुर्द निवासी हर्ष पिछले दस वर्षों से पंडवानी साधना से जुड़े हैं। वे वृंदावन कृष्ण कला महोत्सव, इंटरनेशनल थिएटर ओलंपियाड जगन्नाथ पुरी, राज्योत्सव, भोरमदेव महोत्सव और गनियारी महोत्सव सहित कई प्रतिष्ठित आयोजनों में प्रस्तुति दे चुके हैं।
संगतकारों ने प्रस्तुतियों में भरे सुर
दुष्यंत द्विवेदी की प्रस्तुति में रागी परसराम यादव, हारमोनियम पर जीवनलाल साहू, बैंजो पर बिसहत राम साहू, तबला पर तुलसीदास मानिकपुरी, नाल पर जीवन्तजय देवदास और झुमका पर नरेन्द्र विश्वकर्मा ने संगत दी।
इसी तरह हर्ष चंद्राकर की प्रस्तुति में रागी एवं तबला पर ज्ञानेश्वर टांडिया, कोरस में डोमन साहू, हारमोनियम पर उजित निषाद, ढोलक पर वेदप्रकाश रावटे, बैंजो पर करन तारम, मंजीरा पर खिलेश साहू और घुंघरू पर समीर चंद्र साहू ने संगत की।
तीजन बाई की कला को किया याद
कार्यक्रम के समापन अवसर पर अतिथियों ने पद्मविभूषण स्वर्गीय तीजन बाई के लोककला और पंडवानी के क्षेत्र में अमूल्य योगदान को याद किया। वक्ताओं ने कहा कि तीजन बाई ने पंडवानी को देश-दुनिया में पहचान दिलाई और उनकी कला आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणास्रोत बनी रहेगी।
पंडवानी की वेदमती और कापालिक दोनों शैलियों में प्रस्तुत भावपूर्ण कार्यक्रम ने तीजन बाई को समर्पित श्रद्धांजलि समारोह को यादगार बना दिया।



