खैरागढ़ की जनता वर्षों से जिस बाईपास पुल का इंतजार कर रही है, वह पुल उद्घाटन से पहले ही पहली बारिश के सामने घुटने टेकता नजर आया। आमनेर नदी पर निर्माणाधीन पुल के नीचे का हिस्सा ढह गया और इसके साथ ही निर्माण की गुणवत्ता, ठेकेदार की कार्यशैली, संबंधित विभाग की निगरानी और प्रशासन की चुप्पी भी सवालों के घेरे में आ गई है
खैरागढ़ शहर को जाम से राहत देने के लिए करोड़ों रुपये की लागत से आमनेर नदी पर बाईपास पुल बनाया जा रहा है। लेकिन लगता है पुल की असली गुणवत्ता जांच किसी लैब में नहीं, बल्कि पहली बारिश ने कर दी। बारिश आई... और पुल के नीचे का हिस्सा भी साथ ले गई।
मौके पर मिट्टी का भारी कटाव और ढही हुई संरचना साफ दिखाई दे रही है। सवाल यह है कि अगर निर्माण इतना मजबूत था, तो पहली ही बारिश में यह हाल क्यों हुआ? क्या गुणवत्ता केवल कागजों में थी और मजबूती सिर्फ फाइलों तक सीमित रह गई?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि निर्माण कार्य में गुणवत्ता से समझौता किया गया। पहली ही बारिश में नुकसान होना सिर्फ तकनीकी कमी नहीं, बल्कि जिम्मेदारों की लापरवाही की कहानी बयां कर रहा है।
हैरानी की बात यह भी है कि इस पुल का निर्माण पहले भी कई ठेकेदारों के बदलने और ब्लैकलिस्ट होने के कारण वर्षों तक अटका रहा। जनता के करोड़ों रुपये खर्च होते रहे, लेकिन पुल आज तक पूरा नहीं हो सका। इस बार भी बारिश से पहले निर्माण पूरा करने का दावा किया गया था, मगर ठेकेदार की सुस्ती और विभागीय निगरानी की कमजोरी ने सारी हकीकत सामने ला दी।
अब सवाल सिर्फ ढही हुई मिट्टी का नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था का है जो हर बार बारिश के बाद बह जाती है और फिर अगली टेंडर प्रक्रिया में नई कहानी शुरू हो जाती है।
जिला प्रशासन फिलहाल मौन है, संबंधित विभाग जवाब देने से बच रहा है और ठेकेदार की जिम्मेदारी भी कहीं नजर नहीं आ रही। लेकिन जनता पूछ रही है कि जब पहली बारिश में ही पुल की नींव हिल गई, तो कल भारी बारिश और बाढ़ में इस पुल पर गुजरने वाले लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन लेगा?
खैरागढ़ की जनता को पुल चाहिए, हर मानसून में बह जाने वाला वादा नहीं। अब जरूरत है पूरे निर्माण कार्य की उच्च स्तरीय तकनीकी जांच, जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदार पर कड़ी कार्रवाई की, ताकि विकास केवल शिलान्यास के पत्थरों पर नहीं, जमीन पर भी दिखाई दे।

