खैरागढ़। जिस काम के लिए अक्सर प्रशासन को बुलडोजर, पुलिस बल और लंबी कानूनी प्रक्रिया का सहारा लेना पड़ता है, वही काम खैरागढ़ जिले के ग्राम पंचायत चिंगली के ग्रामीणों ने अपनी समझदारी, एकजुटता और आपसी सहमति से कर दिखाया है। वर्षों से अवैध कब्जे का शिकार रही लगभग 25 एकड़ चारागाह भूमि अब ग्रामीण स्वयं खाली कर रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि पूरे गांव में कहीं भी विवाद, तनाव या विरोध की स्थिति नहीं है, बल्कि लोग इस ऐतिहासिक पहल को किसी त्योहार की तरह मना रहे हैं।
गांव के लोगों ने यह साबित कर दिया कि यदि समाज अपनी जिम्मेदारी समझ ले तो सरकारी जमीन को बचाने के लिए न बुलडोजर की जरूरत पड़ती है और न ही पुलिस बल की। यहां कब्जाधारी स्वयं आगे आकर अपना अवैध कब्जा हटा रहे हैं। यह दृश्य उन लोगों के लिए बड़ा संदेश है, जो वर्षों से सरकारी जमीन पर कब्जा जमाकर बैठे हैं और उसे अपनी निजी संपत्ति समझने लगे हैं।
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इस अभियान में ग्रामीणों के साथ पटवारी भी मौजूद हैं। मौके पर सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार भूमि का सीमांकन और चिन्हांकन किया जा रहा है तथा संबंधित लोगों को उनकी वास्तविक सीमा बताई जा रही है। इसके बाद लोग स्वेच्छा से अपने कब्जे हटा रहे हैं। फिलहाल यह अभियान पहले चरण में चल रहा है और आने वाले समय में गांव की अन्य सरकारी जमीनों को भी अतिक्रमण मुक्त कराने की तैयारी है।
दरअसल, प्रदेश के अनेक गांवों में चरागाह भूमि, खेल मैदान, तालाब, शासकीय रास्ते और अन्य सार्वजनिक भूमि वर्षों से प्रभावशाली लोगों के अवैध कब्जे में हैं। कई जगह ग्रामीण चाहकर भी आवाज नहीं उठा पाते, क्योंकि रसूखदारों के दबाव के सामने उनकी बोलती बंद हो जाती है। इसका सीधा असर गांव के विकास पर पड़ता है। चारागाह खत्म होने से पशुपालकों को परेशानी होती है, खेल मैदान नहीं बचते, सार्वजनिक सुविधाएं विकसित नहीं हो पातीं और गांव का भविष्य प्रभावित होता है।
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ऐसे समय में ग्राम पंचायत चिंगली ने जो उदाहरण पेश किया है, वह केवल खैरागढ़ जिले के लिए नहीं बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ के लिए प्रेरणा है। यहां यह संदेश साफ है कि यदि गांव एकजुट हो जाए, नियमों का सम्मान करे और सार्वजनिक हित को व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर रखे, तो वर्षों पुराने विवाद भी बिना किसी टकराव के समाप्त किए जा सकते हैं।
यह पहल उन प्रभावशाली कब्जाधारियों के लिए भी एक बड़ा संदेश है, जो आज भी कई-कई एकड़ सरकारी जमीन पर कब्जा जमाए बैठे हैं। चिंगली के ग्रामीणों ने बता दिया कि विकास का रास्ता कब्जा करने से नहीं, बल्कि सार्वजनिक संपत्ति को समाज के हित में वापस सौंपने से निकलता है।
अब सवाल केवल इतना है कि जब एक गांव बिना बुलडोजर, बिना पुलिस और बिना विवाद के सरकारी जमीन को अतिक्रमण मुक्त करा सकता है, तो बाकी गांव क्यों नहीं? शायद इस सवाल का जवाब अब केवल ग्रामीणों को ही नहीं, बल्कि शासन और प्रशासन को भी देना होगा।
DNnews की राय:
चिंगली ने साबित कर दिया कि विकास की शुरुआत सरकारी जमीन बचाने से होती है। यदि प्रदेश के हर गांव में ऐसी ही सामाजिक जागरूकता और एकजुटता दिखाई दे, तो चरागाह, खेल मैदान, तालाब और सार्वजनिक भूमि फिर से गांवों की पहचान बन सकती है। यह केवल अतिक्रमण हटाने की खबर नहीं, बल्कि ग्रामीण लोकतंत्र और सामाजिक जिम्मेदारी की एक प्रेरणादायक मिसाल है।

