छुईखदान। छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति और ग्रामीण परंपराओं से जुड़े तीजा-पोला पर्व को लेकर छुईखदान नगर सहित आसपास के गांवों में तैयारियां जोर पकड़ने लगी हैं। घरों में साफ-सफाई और पूजा-पाठ की तैयारियां चल रही हैं, वहीं नगर के बाजारों में भी पोला पर्व की रौनक दिखाई देने लगी है। मिट्टी से बने पोरा-जांता, बैल, छोटी बैलगाड़ियां और पारंपरिक खिलौने बाजार में नजर आने लगे हैं।
पोला पर्व पर ग्रामीण अंचलों में मिट्टी से बने बैल, जांता और छोटी बैलगाड़ियों की पूजा करने की वर्षों पुरानी परंपरा रही है। इसी परंपरा को कायम रखने के लिए छुईखदान क्षेत्र के कुंभकार परिवारों ने कई दिन पहले से मिट्टी की पारंपरिक वस्तुएं तैयार करना शुरू कर दिया था। पर्व नजदीक आते ही इनकी मांग भी बढ़ने लगी है।
महंगाई ने बढ़ाई कुंभकारों की चिंता
बढ़ती महंगाई के बीच पारंपरिक मिट्टी के सामान बनाने वाले कुंभकारों के सामने कारोबार चलाने की चुनौती भी बढ़ती जा रही है। कुंभकारों का कहना है कि मिट्टी, रंग, ईंधन और अन्य आवश्यक सामग्री की लागत बढ़ने से पहले की अपेक्षा सामान तैयार करने में अधिक खर्च हो रहा है।
इसके बावजूद ग्राहकों की जेब का ध्यान रखते हुए कीमत बढ़ाना आसान नहीं है। बाजार में मिट्टी से तैयार पोरा-जांता और छोटी बैलगाड़ियां लेकर पहुंचे विक्रेता बिक्री करते नजर आ रहे हैं। विक्रेताओं के मुताबिक पिछले वर्ष पोरा-जांता की कीमत करीब 100-120 रुपये थी और इस वर्ष महंगाई की मार से लगभग 150 रुपये में ही बिक्री की जा रही है। वहीं छोटी मिट्टी की बैलगाड़ियों की कीमत उनके आकार और सजावट के आधार पर अलग-अलग रखी गई है।
बदलते दौर में भी कायम है परंपरा
आधुनिकता और महंगाई के दौर में भी छुईखदान क्षेत्र के ग्रामीणों में तीजा-पोला पर्व को लेकर खासा उत्साह बना हुआ है। लोग मिट्टी से बने पारंपरिक सामान खरीदकर वर्षों पुरानी परंपरा को आगे बढ़ाने की तैयारी कर रहे हैं।
कुंभकारों को उम्मीद है कि पर्व के अंतिम दिनों में बाजार में खरीदारी बढ़ेगी और उन्हें अपनी मेहनत का उचित लाभ मिल सकेगा। मिट्टी के बैल और पारंपरिक खिलौनों की खरीदारी केवल पर्व की रस्म नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की लोककला और ग्रामीण संस्कृति को जीवित रखने की कोशिश भी है।




