खैरागढ़। छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक लोककलाओं के संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में ग्राम भरदा कला में आयोजित पांच दिवसीय छत्तीसगढ़ी नाचा-गम्मत कार्यशाला का 9 अक्टूबर को समापन हुआ। संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन के सहयोग से गंवईहा लोकनाट्य संस्था मोहंदी, जिला राजनांदगांव द्वारा आयोजित इस कार्यशाला में प्रशिक्षणार्थियों को प्रदेश की पारंपरिक लोकनाट्य विधा नाचा-गम्मत की विभिन्न बारीकियों से रूबरू कराया गया।
प्रख्यात नाचा-गम्मत कलाकार अजय उमरे के मार्गदर्शन में आयोजित इस कार्यशाला के दौरान प्रशिक्षणार्थियों ने लोकनाट्य की कथावस्तु, वेशभूषा, रूप-सज्जा, भाषा-शैली, अंग संचालन तथा गीत-संगीत के विविध पहलुओं का प्रशिक्षण प्राप्त किया। इसके साथ ही उन्हें नाचा-गम्मत के इतिहास, वरिष्ठ कलाकारों के योगदान और उनकी कला यात्रा के बारे में भी विस्तार से जानकारी दी गई।
प्रस्तुतियों के जरिए दिखाई सीखी हुई कला
कार्यशाला के समापन अवसर पर ग्राम भरदा कला में प्रशिक्षणार्थियों ने नाचा-गम्मत की प्रस्तुतियां देकर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। इन प्रस्तुतियों में प्रशिक्षण के दौरान सीखे गए कला-कौशल, अभिनय, संवाद अदायगी और लोकनाट्य की पारंपरिक शैली की झलक देखने को मिली।
प्रस्तुतियों के माध्यम से छत्तीसगढ़ी नाचा-गम्मत की मौलिकता, विशिष्टता और सांस्कृतिक महत्व को सामने लाने का प्रयास किया गया। इस आयोजन ने प्रशिक्षणार्थियों को अपनी कला को मंच पर प्रस्तुत करने तथा पारंपरिक लोकनाट्य की बारीकियों को व्यवहारिक रूप से समझने का अवसर प्रदान किया।
लोककला के संरक्षण और नई पीढ़ी को जोड़ने पर जोर
कार्यशाला के समापन समारोह में वरिष्ठ रंगकर्मी एवं निर्देशक डॉ. योगेंद्र चौबे, आनंद कुमार पांडे, प्रख्यात नाचा-गम्मत कलाकार अजय उमरे और कामता साहू विशेष रूप से उपस्थित रहे। अतिथियों ने अपने अनुभव साझा करते हुए छत्तीसगढ़ी लोककलाओं के संरक्षण, संवर्धन और उनके निरंतर विकास की आवश्यकता पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि नाचा-गम्मत जैसी पारंपरिक लोकनाट्य विधाएं छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इन कलाओं को जीवंत बनाए रखने के लिए अनुभवी कलाकारों के ज्ञान और अनुभव को नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है। प्रशिक्षण और मंचीय प्रस्तुतियों के माध्यम से युवाओं को लोककला से जोड़ने के प्रयास भविष्य में इस परंपरा को आगे बढ़ाने में सहायक होंगे।
सांस्कृतिक विरासत को सहेजने की पहल
पांच दिवसीय इस कार्यशाला ने प्रशिक्षणार्थियों को छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य की परंपरा, मौलिकता और प्रस्तुति की बारीकियों को समझने का अवसर दिया। ऐसे आयोजन न केवल स्थानीय कलाकारों की प्रतिभा को निखारते हैं, बल्कि प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और पारंपरिक लोककलाओं को नई पहचान दिलाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में भरदा कला में आयोजित यह कार्यशाला एक सार्थक पहल रही।
DNnews | खबर वही, जो लगे सही



