खैरागढ़। indira kala sangit vishvvidyalay khairagarh प्रेम, लोक परंपरा, ग्रामीण जीवन और सामाजिक भेदभाव की कहानी जब मंच पर जीवंत हुई, तो दर्शक कभी तालियां बजाते नजर आए, तो कभी भावुक हो उठे। राजकुमारी इंदिरा सिंह कला संगीत विश्वविद्यालय के कैंपस-2 स्थित प्रेक्षागृह में बीती शाम नाट्य विभाग के विद्यार्थियों ने नाटक ‘बरदईहा’ का प्रभावशाली मंचन किया। ग्रामीण परिवेश में पनपी प्रेम कहानी और उसके दर्दनाक अंत ने दर्शकों को अंत तक बांधे रखा। नाटक के समापन के बाद भी इसकी कहानी और सामाजिक सवाल दर्शकों के बीच चर्चा का विषय बने रहे।
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प्रेक्षागृह विद्यार्थियों से खचाखच भरा रहा। मंच पर ग्रामीण जीवन की सजीव झलक, लोकगीतों की मिठास और कलाकारों के दमदार अभिनय ने पूरे वातावरण को जीवंत बना दिया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ. लवली शर्मा, प्रोफेसर राजन यादव, डॉ. मानस साहू और डॉ. दीपशिखा पटेल सहित अन्य लोग मौजूद रहे।
प्रेम की कहानी, जिसका अंत रुला गया
‘बरदईहा’ की कहानी एक ऐसे गांव की है, जहां जातिगत भेदभाव और सामाजिक मर्यादाओं के बीच ग्रामीण जीवन की अपनी परंपराएं हैं। गांव की ग्रामसभा में सरपंच की मौजूदगी में तय होता है कि किस काम के बदले कितना खड़ी धान दिया जाएगा। इसी परिवेश में सरपंच की पढ़ी-लिखी बेटी सुखिया और अनपढ़ बरदईहा (मंगलु) के बीच प्रेम पनपता है।
दोनों की मुलाकातें धीरे-धीरे प्रेम में बदल जाती हैं, लेकिन यह रिश्ता सामाजिक बंधनों और परिवार की प्रतिष्ठा के सामने चुनौती बन जाता है। जब सरपंच के बेटे को दोनों के प्रेम संबंध की जानकारी मिलती है, तो वह बरदईहा को जमकर फटकार लगाता है। इस घटना से आहत होकर बरदईहा के पिता उसे गांव से दूर भेज देते हैं।
हालांकि, दिवाली नजदीक आते ही गांव को फिर बरदईहा की याद सताने लगती है। पारंपरिक सोहाई बांधने की रस्म के लिए उसे जंगल से वापस बुलाया जाता है। लेकिन गांव वापसी के साथ ही उसकी जिंदगी एक ऐसे मोड़ पर पहुंच जाती है, जिसका अंत बेहद दर्दनाक होता है।
लोक परंपराओं के बीच सामाजिक भेदभाव की कड़वी हकीकत
नाटक में मातर, गौरी-गौरा, लोकगीतों और प्रेम-विरह के गीतों के माध्यम से छत्तीसगढ़ी लोकजीवन को खूबसूरती से प्रस्तुत किया गया। मंच पर झोपड़ी, पेड़, हल्की रोशनी और चारा खाती गाय ने गांव का ऐसा दृश्य रचा कि दर्शक खुद को ग्रामीण परिवेश के बीच महसूस करने लगे।
कहानी का सबसे मार्मिक दृश्य तब सामने आता है, जब बरदईहा और सुखिया के प्रेम संबंध का खुलासा होने के बाद सरपंच का बेटा उसके साथ मारपीट करता है। इसके बाद ग्रामीणों के साथ मिलकर उसकी हत्या कर देता है। इसी दौरान सुखिया अपने भाई को बताती है कि उसने केवल बरदईहा की ही नहीं, बल्कि उसके गर्भ में पल रहे पांच महीने के बच्चे की भी जान ले ली है।
इस दृश्य ने नाटक को एक गहरी सामाजिक संवेदना से जोड़ दिया। प्रेम, जातिगत भेदभाव, सामाजिक प्रतिष्ठा और ग्रामीण सत्ता व्यवस्था के बीच इंसानियत कहां खो जाती है, नाटक ने इस सवाल को दर्शकों के सामने छोड़ दिया।
अभिनय, संगीत और मंच सज्जा ने बांधा समां
नाटक की खासियत इसकी सशक्त कहानी के साथ कलाकारों का जीवंत अभिनय रहा। हर दृश्य में ग्रामीण जीवन की सहजता और पात्रों की भावनाओं को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया। डॉ. शिशु कुमार सिंह का निर्देशन कहानी को गति देने के साथ-साथ उसके भावनात्मक पक्ष को उभारने में सफल रहा।
मंगलु की भूमिका में खगेश पैकरा और सुखिया की भूमिका में आकाशी मेश्राम ने अपने अभिनय से दर्शकों का ध्यान खींचा। वहीं खोरबहरा की भूमिका में काव्य त्रिमले और गुरु की भूमिका में रूपेश तेंडुलकर ने प्रभावशाली अभिनय किया। पिता जी की भूमिका देव सिंह, माता जी की भूमिका वंदिता शुक्ला, गौटिया कैलास की भूमिका समीर चंद्र साहू और गौटनिन की भूमिका सिजी सिरमौर ने निभाई।
कोरस में दीपक साहू, हर्षित डेहरिया, आनंद वैष्णल, ओमेंद्र कावडे, चिकू, आकाश चंद्रवंशी, दीपाली और दीक्षा बघेल ने अपनी प्रस्तुति से नाटक को और प्रभावी बनाया।
लोक संगीत ने बढ़ाई नाटक की खूबसूरती
नाटक में संगीत ने ग्रामीण परिवेश और भावनात्मक दृश्यों को खास रंग दिया। गायन की जिम्मेदारी हर्ष चंद्राकर, साक्षी और खुशी गजेंद्र ने संभाली। वेद प्रकाश रावटे ने तबला और गुदुम, करन तारम ने हारमोनियम एवं मोहरी, उजित निषाद ने बैंजो, सौरभ ने बांसुरी और कामेश साहू ने दफड़ा पर संगत दी।
नाटक का लेखन दीपक कुमार साहू ने किया, जबकि निर्देशन डॉ. शिशु कुमार सिंह ने किया। संगीत और मंच सजावट की जिम्मेदारी हर्ष चंद्राकर ने पुनेश ध्रुव के साथ संभाली। प्रकाश व्यवस्था का डिजाइन सागर गुप्ता ने तैयार किया। प्रस्तुति में सौरभ, करन कुंजाम, कपील मिरी और स्वास्तिक का भी सहयोग रहा।
तालियों के साथ दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर गया ‘बरदईहा’
‘बरदईहा’ केवल एक प्रेम कहानी नहीं, बल्कि ग्रामीण समाज की परंपराओं, सामाजिक असमानता और मानवीय संवेदनाओं को सामने लाने वाली नाट्य प्रस्तुति रही। नाटक ने जहां छत्तीसगढ़ी लोकसंस्कृति की खूबसूरती को मंच पर उतारा, वहीं इसके दर्दनाक अंत ने सामाजिक भेदभाव और इंसानियत से जुड़े कई सवाल खड़े किए।
पूरी प्रस्तुति के दौरान दर्शकों की तालियां कलाकारों का उत्साह बढ़ाती रहीं। वहीं अंतिम दृश्य ने दर्शकों को गंभीर चिंतन के लिए मजबूर कर दिया। इस तरह ‘बरदईहा’ ने साबित किया कि रंगमंच केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के सामने आईना रखने और उसकी संवेदनाओं को झकझोरने का सशक्त माध्यम भी है।


