खैरागढ़। वन अग्नि (दावानल) केवल जंगल की सतह पर बिछी पत्तियों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह बीज, छोटे पौधे, झाड़ियाँ, घास, सूखी लकड़ियाँ तथा मिट्टी में मौजूद पोषक तत्वों को भी नष्ट कर देती है। इसके कारण वनों का प्राकृतिक पुनरुत्पादन बाधित हो जाता है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो फंगस और बैक्टीरिया जैसे सूक्ष्म जीव, जो सूखी पत्तियों व लकड़ियों के सड़ने-गलने से बनते हैं, वनों के पुनर्जीवन में अहम भूमिका निभाते हैं, लेकिन आग से ये तत्व भी समाप्त हो जाते हैं।
वन अग्नि से जमीन के भीतर लगभग एक फीट तक की उर्वरक क्षमता नष्ट हो जाती है। मिट्टी की ऊपरी सतह पक जाने से वर्षा जल का अवशोषण नहीं हो पाता, जिससे जल तेजी से बह जाता है और भू-जल स्तर में गिरावट आती है। नमी लंबे समय तक न टिक पाने से वनस्पतियों का विकास प्रभावित होता है। इसके साथ ही औषधीय वन प्रजातियाँ नष्ट हो जाती हैं, जिससे वनांचलवासियों की आजीविका पर भी सीधा असर पड़ता है।
वन अग्नि से वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास प्रभावित होता है। कई बार वन्यजीव आग की चपेट में आ जाते हैं या भटककर मानव बस्तियों की ओर आ जाते हैं, जिससे मानव-वन्यप्राणी संघर्ष की आशंका बढ़ जाती है। जंगल खुलने से अवैध शिकार की घटनाओं में वृद्धि तथा खाद्य श्रृंखला के असंतुलन का खतरा भी उत्पन्न होता है। धुएँ के कारण पर्यावरण प्रदूषण बढ़ता है और जैव विविधता का प्राकृतिक ढांचा गंभीर रूप से प्रभावित होता है।
इन दूरगामी दुष्प्रभावों को देखते हुए वनमंडल अधिकारी खैरागढ़ द्वारा वन अग्नि की रोकथाम एवं प्रबंधन को लेकर विशेष संजीदगी दिखाई जा रही है। प्रतिवर्ष किए जाने वाले कार्यों—जैसे फायर लाइन कटाई व सफाई, फायर वाचर्स की तैनाती तथा आग की सूचना मिलते ही तत्काल नियंत्रण—के साथ-साथ इस वर्ष अतिरिक्त और नवाचारी कदम उठाए गए हैं।
इसी क्रम में वनमंडल कार्यालय खैरागढ़ में फॉरेस्ट फायर कंट्रोल रूम की स्थापना की गई है। जनसामान्य से अपील की गई है कि वन अग्नि की किसी भी घटना की तत्काल सूचना मोबाइल नंबर 9301321797 पर दें, ताकि समय रहते आग पर काबू पाया जा सके।
इसके अलावा नवाचार के तहत महुआ वृक्ष ब्लेज़िंग कर कंट्रोल बर्निंग, गांवों में मुनादी, दीवार लेखन, पोस्टर चस्पा करना, स्कूली छात्र-छात्राओं के लिए वाद-विवाद, निबंध, चित्रकला व रंगोली प्रतियोगिताएं तथा सरपंचों और संयुक्त वन प्रबंधन समिति अध्यक्षों को पोस्टकार्ड के माध्यम से अपील जैसे कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं।
जनजागरूकता अभियान के अंतर्गत 03 फरवरी 2026 से खैरागढ़, छुईखदान, गंडई और साल्हेवारा परिक्षेत्र के अंतर्गत कुल 36 गांवों में नुक्कड़ नाटक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। अंचल के सुप्रसिद्ध कलाकारों से सुसज्जित “झंकार कला मंच” (पैलीमेटा) की टीम द्वारा अग्नि सुरक्षा पर आधारित सजीव झांकियों के माध्यम से ग्रामीणों को जागरूक किया जा रहा है।
इसी कड़ी में 07 फरवरी 2026 को छुईखदान परिक्षेत्र के ग्राम कानीमेरा, हाटबंजा एवं बुढ़ानभात में कार्यक्रम आयोजित हुआ, जहां प्रत्येक गांव में लगभग 200 से 250 ग्रामीणों (महिला, पुरुष एवं बच्चों) की सहभागिता रही। झंकार कला मंच के संचालक श्री प्रकाश वैष्णव ने बताया कि कार्यक्रम के माध्यम से ग्रामीणों को वन अग्नि से होने वाले नुकसान की जानकारी दी जा रही है और आग से बचाव व प्रबंधन के लिए सतर्क रहने की अपील की जा रही है।
कार्यक्रमों के दौरान वन अधिकारी एवं कर्मचारी भी उपस्थित रहकर ग्रामीणों को वन अग्नि के दुष्प्रभावों से अवगत करा रहे हैं तथा प्रभावी नियंत्रण के लिए वन विभाग का सहयोग करने का आह्वान कर रहे हैं। संयुक्त वन प्रबंधन समितियों की बैठकों में भी अग्नि सुरक्षा विषय को प्राथमिकता से शामिल किया जा रहा है।


