साल्हेवारा। छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति की पहचान केवल लोकगीतों, नृत्य और लोकवाद्यों से नहीं, बल्कि उन कलाकारों की साधना से भी है, जिन्होंने सीमित संसाधनों के बीच अपनी कला को जीवन का हिस्सा बना लिया। ऐसे ही समर्पित लोक कलाकार, गीतकार, गायक, वादक एवं रंगकर्मी हैं भरतलाल हरिन्द्र, जिन्होंने वनांचल के छोटे से ग्राम रामपुर से अपनी कला-यात्रा शुरू कर छत्तीसगढ़ी लोककला की आवाज को आकाशवाणी रायपुर तक पहुंचाया।
16 वर्ष की उम्र में शुरू हुई कला की यात्रा
भरतलाल हरिन्द्र का जन्म 11 दिसंबर 1958 को ग्राम रामपुर, तहसील साल्हेवारा, जिला खैरागढ़-छुईखदान-गंडई में हुआ। उनके पिता स्व. गेन्दलाल हरिन्द्र और माता स्व. कुंवारियां बाई हरिन्द्र थीं। उन्होंने आठवीं तक शिक्षा प्राप्त की और बाद में कृषि को अपना व्यवसाय बनाया। हालांकि बचपन से ही संगीत के प्रति उनका गहरा लगाव था।
महज 16 वर्ष की उम्र में उन्होंने छत्तीसगढ़ी नाच पार्टी में बेंजो वादक के रूप में अपनी कला-यात्रा शुरू की। निरंतर अभ्यास और संगीत के प्रति समर्पण ने उन्हें लोककला के व्यापक मंच तक पहुंचाया। इसी क्रम में वे प्रसिद्ध लोककलाकार धुरवाराम मरकाम द्वारा स्थापित लोक कला मंच ‘मया के फूल’ से जुड़े। यहां उन्होंने गायन, वादन और अभिनय तीनों विधाओं में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया और करीब सात वर्षों तक लोककला की साधना की।
आकाशवाणी रायपुर तक पहुंची लोकधुन
लोककला के क्षेत्र में सक्रियता के दौरान उनका स्वर परीक्षण आकाशवाणी रायपुर में ‘धुरवाराम मरकाम और साथी’ के नाम से हुआ। इसके बाद उन्होंने प्रसिद्ध लोकगायिका दुखिया बाई के साथ अपनी रचनाओं को स्वर दिया, जिनका प्रसारण आकाशवाणी रायपुर से हुआ।
उनकी चर्चित रचनाओं में ‘संझा के बेरिया’, ‘कुंआ के पानी’, ‘ये भारत के माटी’ और ‘आ दुनों संग मा’ सहित अनेक लोकगीत शामिल हैं। उनकी रचनाओं में छत्तीसगढ़ की मिट्टी, लोकजीवन, रिश्तों, परंपराओं और ग्रामीण संवेदनाओं की सहज झलक दिखाई देती है।
‘फुलवारी’ संस्था की स्थापना
वर्ष 1988 में भरतलाल हरिन्द्र ने अपने गृह ग्राम रामपुर में स्वयं की सांस्कृतिक संस्था ‘फुलवारी’ की स्थापना की। इसके माध्यम से उन्होंने ग्रामीण क्षेत्र में लोककला और संस्कृति को आगे बढ़ाने का प्रयास किया। बाद में उन्होंने अपने नाम से आकाशवाणी रायपुर में पुनः स्वर परीक्षण दिया और सफल हुए। उनकी रचनाओं एवं प्रस्तुतियों को आकाशवाणी से प्रसारण का अवसर मिला।
उनकी चर्चित रचना ‘कुंआ के पानी, कुंवासी लागे’ आज भी विशेष रूप से जानी जाती है, जिसे उन्होंने दुखिया बाई के साथ स्वर दिया। उनकी कई रचनाओं को छत्तीसगढ़ के चर्चित गायकों अनुराग शर्मा, महादेव हिरवानी और विवेक शर्मा सहित अन्य कलाकारों ने भी अपनी आवाज दी है।
फिल्मी दुनिया तक पहुंचा रचनात्मक सफर
भरतलाल हरिन्द्र की रचनात्मक प्रतिभा का प्रभाव लोकमंच तक ही सीमित नहीं रहा। छत्तीसगढ़ी सिनेमा के चर्चित निर्माता-निर्देशक सतीश जैन द्वारा उनकी रचना को फिल्म में शामिल करने का प्रस्ताव दिया जाना उनके साहित्यिक एवं सांस्कृतिक योगदान के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जाता है।
लोककला को मनोरंजन नहीं, संस्कृति की अभिव्यक्ति माना
भरतलाल हरिन्द्र की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्होंने लोककला को महज मनोरंजन का माध्यम नहीं माना। उनके लिए लोकगीत छत्तीसगढ़ की माटी, लोकजीवन, परंपरा और जनभावनाओं की अभिव्यक्ति रहे। ग्रामीण परिवेश और सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने लगातार अपनी कला को साधा और अपनी जड़ों से जुड़े रहे।
उनकी जीवन-यात्रा यह संदेश देती है कि प्रतिभा को हमेशा बड़े शहरों, महंगे संसाधनों या बड़े मंच की जरूरत नहीं होती। यदि लगन, अभ्यास और अपनी संस्कृति के प्रति समर्पण हो तो गांव की चौपाल से उठी आवाज भी आकाशवाणी जैसे बड़े मंच तक पहुंच सकती है।
आज भी संस्कृति की सेवा में जुटे हैं
वर्तमान में भरतलाल हरिन्द्र ‘गुरु कृपा मानस मंडली, रामपुर’ का संचालन कर रहे हैं। साथ ही वे तुलसी मानस प्रतिष्ठान, जिला इकाई के उपाध्यक्ष का दायित्व भी संभाल रहे हैं। यह जिम्मेदारी उन्हें प्रतिष्ठान के मानस पथिकों द्वारा सौंपी गई है।
भरतलाल हरिन्द्र की कला-यात्रा दरअसल छत्तीसगढ़ी लोकसंस्कृति की उस जीवंत परंपरा की कहानी है, जिसमें गांव की मिट्टी की खुशबू, लोकजीवन की संवेदना और संस्कृति की आत्मा गीतों के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही है। वनांचल के इस लोक साधक ने अपनी साधना से यह साबित किया है कि सच्ची कला को पहचान दिलाने के लिए मंच से ज्यादा जरूरी समर्पण और निरंतर साधना होती है।



