खैरागढ़। वन मंडल खैरागढ़ के अंतर्गत वन परिक्षेत्र साल्हेवारा–छुईखदान इन दिनों तस्करों के लिए मानो “ओपन मार्केट” बन गया है। जंगलों में वन्य जीवों की तस्करी जिस बेखौफ अंदाज़ में चल रही है, उसे देखकर लगता है कि तस्कर ही असली गश्ती दल हैं और विभाग केवल कागजों में सक्रिय है।
जंगलों में जंगली सूअर से लेकर इमारती लकड़ी और अर्जुन (कहुआ) जैसे बहुमूल्य पेड़ों तक की तस्करी खुलेआम हो रही है, लेकिन विभागीय कार्रवाई गिनी-चुनी घटनाओं तक सीमित रह जाती है — जिन पर बाद में वाहवाही का प्रेस नोट जरूर जारी हो जाता है।
बताया जाता है कि कई अधिकारी-कर्मचारी शायद जंगल का रास्ता भूल चुके हैं। निरीक्षण और रोडमैप की जगह एसी कमरों में बैठकर बिल-वाउचर तैयार करने की परंपरा ज्यादा मजबूत दिखती है। उधर जंगल में तस्कर पूरी “फील्ड ड्यूटी” निभा रहे हैं। वन मंडल अधिकारी खैरागढ़, उपवन मंडल अधिकारी,वन परिक्षेत्राधिकारी, डिप्टी रेंजर साल्हेवारा- छुईखदान के अधिकारी मस्तमौला है,
प्राप्त जानकारी के अनुसार 5 मार्च को वन विभाग ने गुप्त सूचना पर कार्रवाई करते हुए स्कॉर्पियो (MH 35 P 1022) को पकड़ा, जिसमें दो जंगली सूअर का अवैध परिवहन हो रहा था। इस दौरान मंगल तिल्लासी और हर्षदीप चव्हाण को गिरफ्तार कर वाहन जब्त किया गया। हालांकि सवाल यह है कि रोजाना चल रही तस्करी पर ऐसी कार्रवाई कितनी असरदार है?
ग्रामीण इलाकों से लेकर जंगलों तक इमारती लकड़ी की निर्बाध सप्लाई, सागौन,नीम-बबूल-आम जैसे पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और लाल ईंट भट्टों के संचालन के लिए हरी-भरी लकड़ी की बलि — सब कुछ “खुला राज” है। शिकायतें भी होती हैं, लेकिन विभाग के कानों में जूं रेंगने की खबर कम ही मिलती है।
ऐसे हालात में सवाल उठता है कि करोड़ों के वृक्षारोपण का क्या हुआ और संरक्षण की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? अब निगाहें वन मंत्री केदार कश्यप पर हैं कि वे इस “कागजी चौकसी” की गहन जांच कराते हैं या जंगल यूं ही तस्करों के भरोसे चलता रहेगा।


